12 ज्योतिर्लिंगों में से एक केदारनाथ धाम उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में हिमालय की गोद में स्थित है. मंदाकिनी नदी के किनारे स्थित केदारनाथ धाम की समुद्र तल से ऊंचाई 3, 584 मीटर है. दुर्गम रास्ते और प्रतिकूल जलवायु के चलते केदारनाथ धाम के कपाट हर साल अप्रैल औ मई की महीने खुलते हैं. नवंबर की महीने तक श्रद्धालु केदारनाथ धाम के दर्शन के लिए आते हैं.

गौरीकुंड से पैदल यात्रा

केदारनाथ पहुंचने के लिए गौरीकुंड से पैदल यात्रा शुरु होती है. श्रद्धाल करीब 18 किमी. की पैदल यात्रा कर केदारनाथ धाम पहुंचते हैं.

अति प्राचीन है केदारनाथ मंदिर

कत्यूरी शैली में बने मंदिर की भव्यता सैकड़ों साल से श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है. कहा जाता है, कि मंदिर का निर्माण पांडव वंश के राजा जन्मेजय ने कराया था. यहां स्थित शिवलिंग अति प्राचीन है और स्वयंभू भी है. मंदिर का जीर्णोद्वार आदि शंकराचार्य ने कराया था.

सदियों पुराना है मंदिर

यूं तो केदारनाथ धाम की स्थापना कब हुई, मंदिर का निर्माण कब हुआ, कोई प्रमाणिक इतिहास नहीं मिलता. लेकिन पिछले 1000 साल से केदारनाथ एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल रहा है. कहा जाता है कि  आदि शंकराचार्य ने मंदिर का जीर्णोद्धार आठवीं शताब्दी में कराया था.

मंदिर की सीढ़ियों पर पाली और ब्राह्मी लिपि मे लिखा हुआ है. जिसका अनुवाद करने की कोशिश कई इतिहासकारों ने की है. लेकिन कभी स्पष्ट अर्थ नहीं निकला.

सुबह के वक्त शिवलिंग पर घी का लेप किया जाता है.  धूप- अगरबत्ती के उपरांत पूजा की जाती है. शाम के समय भगवान शिव का श्रृंगार के साथ पूजा- अर्चना की जाती है.

मंदिर को लेकर मान्यता

केदारनाथ धाम के बारे में कई तरह की कथाएं प्रचलित है. कहा जाता है कि महाभारत की युद्ध विजयी होने के बाद पांचो पांडव अपने भाइयों और संबंधियों की हत्या के पाप से मुक्ति पाना चाहते थे. वे भगवान शंकर का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए पहले काशी गए. लेकिन भगवान शिव ने उन्हें दर्शन नहीं दिया. जिस पर पांडव भगवान शिव की तलाश में हिमालय पहुंचे. लेकिन भगवान उन्हें दर्शन नहीं देना चाहते थे. इसलिए वो केदारपुरी में अंतर्ध्यान हो गए. लेकिन पांडव सत्य निष्ठा के साथ भगवान का पीछा करते रहे.

भगवान शिव ने केदारनाथ में बैल का रूप धारण कर लिया. भीम ने अपने बल का प्रयोग करते हुए वहां मौजूद दूसरे गाय और बैलों को भगा दिया.  ऐसा कहा जाता है कि भीम ने अपने विशाल रूप से दोनों चोटियों पर पैर रखा. लेकिन भगवान शंकर उनके पैर के नीचे से नहीं जाना चाहते थे. इसलिए भीम ने बैल रूपी भगवान शिव को पीछे से पकड़ लिया. कहा जाता है  इसलिए केदारनाथ में बैल के पीठ के भाग की पूजा होती है.  भगवान शिव का अगला भाग काठमांडू में पशुपतिनाथ के मंदिर के तौर पर प्रसिद्ध है. इसी तरह से भुजाएं तुंगनाथ, मुख रुद्रनाथ, नाभि महेश्वर, जटा कल्पेश्वर में प्रकट हुई है.

केदार पर्वत की चोटी पर बसा है धाम

मंदिर के सामने से मंदाकिनी नदी बहती हैं. मंदिर के पीछे भाग में वासुकी ताल है. चोराबाड़ी ग्लेशियर सामने दिखाई देता है. मंदिर के प्रांगण में भक्त लंबी पैदल यात्रा करके जब पहुंचते हैं,  तो अपनी थकान को भूल जाते हैं .

केदारनाथ धाम का सफर

रुद्रप्रयाग से मोटर मार्ग के जरिए गुप्तकाशी और गौरीकुंड तक पहुंच सकते हैं. गौरीकुंड से केदारनाथ धाम के लिए पैदल यात्रा शुरु होती है. करीब 5 से 6 घंटे पैदल चलने के बाद श्रद्धालु केदारनाथ धाम पहुंचते हैं.

ऐसी मान्यता है कि जो भक्त सच्ची निष्ठा और विश्वास से केदारनाथ धाम जाता है. भगवान शिव उसकी मनोकामना को पूरा करते हैं.

केदारनाथ से शहरों की दूरी

ऋषिकेश से केदारनाथ 223 किमी
दिल्ली से केदारनाथ 458 किमी
कानपुर से केदारनाथ 492 किमी
नागपुर से केदारनाथ 1421 किमी
बंगलोर से केदारनाथ 2484 किमी
लखनऊ से केदारनाथ 469 किमी
कोलकाता से केदारनाथ 1,293 किमी
मुंबई से केदारनाथ 1437 किमी
अहमदाबाद से केदारनाथ 1,071 किमी
चेन्नई से केदारनाथ 1,965 किमी

कैसे पहुंचे केदारनाथ

सड़क मार्ग

आप ऋषिकेश, हरिद्वार या देहरादून के रास्ते जा सकते हैं. ऋषिकेश, हरिद्वार या देहरादून पहुंचने के बाद आप रुद्रप्रयाग के लिए कैब या बस ले सकते हैं.

रेल सेवा

आप केदारनाथ ट्रेन के जरिए जाना चाहते हैं. तो ट्रेन सेवा हरिद्वार और देहरादून तक उपलब्ध है. यहां से रुद्रप्रयाग के लिए सड़क मार्ग से जाना होगा

हवाई सेवा

आप किसी भी शहर से देहरादून के जॉली ग्रांट एयरपोर्ट पहुंच सकते हैं. यहां से रुद्रप्रयाग सड़क मार्ग से जा सकते हैं. केदारनाथ के लिए हेली सेवाएं भी उपलब्ध हैं.

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