सांकेतिक तस्वीर

कोरोना काल चल रहा है, ये नया काल है, इसके पहले इसका नाम नहीं सुना था, लोग- बाग लंबे समय से घरों में कैद रहने के बाद अब फिर सामान्य जिंदगी में लौटना चाहते हैं. लेकिन डर भी है.

जिंदगी को पटरी पर लाने उधेड़बुन और रूटीन से ऊबे हम निकल पड़े दिल्ली से नजदीक धार्मिक पर्यटन स्थल हरिद्वार।

हरिद्वार

धर्मनगरी हरिद्वार के सफर पर निकलने का प्लान पहले से नहीं था. मैं रात की शिफ्ट से घर लौटा, दिन में प्लान में बना और शाम होते-होते तय हो गया. अब निकलना है सफर पर. और इस तरह शुरु हो मेरी हरिद्वार यात्रा

हम शाम 8 बजे घर से निकले, मेरे मित्र कुछ ज्यादा ही उत्साहित थे. क्योंकि लगभग 6 महीने बाद किसी यात्रा के लिए निकले थे. हम दोनों बातचीत में मशगूल थे, कुछ ऑफिस की बातें, कुछ धर्म नगरी हरिद्वार की बातें.

घर से दिल्ली से आनंद विहार बस स्टेशन तक सफर कब पूरा हुआ पता ही नहीं चला. कोरोना संकट में यहां का नजारा थोड़ा हैरान करने वाला था. दरअसल स्टेशन पर चारों तरफ सन्नाटा था. एक बार को लगा कि हम कहीं और तो नहीं आ गए. या फिर बस सेवा बंद नहीं. हालांकि थोड़ी ही देर में समझ आ गया. कि ये कोरोना का असर है.

हमने भटकते हुए गार्ड से बात की, तो पता चला कि हरिद्वार के लिए बस यूपी से मिलेंगी, सड़क के उस पार (आंनद विहार में यूपी और दिल्ली का बॉर्डर मिलता है). लिहाजा हम सड़क पार कर उस पार पहुंचे. यहां बस से सफर करने वालों की अच्छी खासी संख्या थी. हम हरिद्वार जाने वाली बस के बारे में पता कर ही रहे थे. कि एक बस कंडक्टर ने हमें ऐसा पकड़ा जैसे प्रभु मिल गए हों.

कंडक्टर हम दोनों को लगभग खींचेते हुए बस में लगा. यहां का नजारा और भी हैरान करने वाला था. बस में हम दोनों के सिवाय कोई नहीं था. लिहाजा मैंने कंडक्टर से सवाल किया, आप कितनी देर चलोगे. उसने जवाब दिया, कोई सवारी नहीं भी मिली, तो आप दोनों को लेकर चलूंगा.

कुछ देर के बाद कुछ और यात्री बस में सवार हुए, करीब 8-10 यात्रियों को लेकर बस चालक ने सफर पर रवाना हुआ. मैं थोड़ा थका हुआ था. सो सीट पर सो गया. करीब दो घंटे बाद बस एक ढाबे पर रुकी, ये पश्चिमी उत्तर प्रदेश का क्षेत्र था. जिसे जाटलैंड कहा जाता है. और गन्ने की खेती के लिए मशहूर है.

खाना खाने के बाद हमारी बस हरिद्वार के रास्ते पर बढ़ चली. रात कोई ढाई बजे फिर आंख खुली, इस बार हम हरिद्वार में थे. बाहर निकलते ही सर्द हवाओं ने स्वागत किया. जिसका अंदाजा पहले से ही था. अलबत्ता बस से नीचे उतरते ही कान पर गमछा लपेटा, चाय के लिए ऑर्डर बोला, ताकि शरीर में कुछ गर्मी आए.

धार्मिक पर्यटन स्थल होने के चलते हरिद्वार में रात में भी रिक्शा आसानी से मिल जाते हैं. ये बात और है कि रात में रिक्शा करना थोड़ा महंगा हो सकता है. हमारे साथ भी यही हुआ. खैर मोलभाव के बात हम रिक्शे से होटल के लिए निकल गए. जहां पहुंच कर हम दोनों ने अगले दिन का प्लान बनाया. और सोने की कोशिश करने लगे. खैर धर्मनगरी को पास से देखने के उत्साह में आंखों से नींद गायब थी.

हरिद्वार दर्शन के उत्साह में मित्र सुबह जल्दी जग गए लेकिन मैं नीद में ही था, उन्होंने मुझे कई बार उठाने की कोशिश की, आखिर ना नुकुर के बाद मैं उठा, मुझे आइडिया था कि कहां कितना और क्या देखना है और कितना टाइम लगेगा ?

रिक्शा पकड़ा और पहुंच गए हरकी पैड़ी, दर्जनों लोग विश्व प्रसिद्ध हरकी पैड़ी पर चारों तरफ मां गंगा की निर्मल अविरल और पावन धारा में डुबकी लगा कर खुद को पापों से मुक्त कर रहे थे, हमने कपड़े उतारे और घाट के किनारे ही मां गंगा की धार में डुबकी लगा दी

डुबकी लगाते ही मानो मोक्ष मिल गया फिर सूर्य देवता को अर्घ्य दिया, फिर आस-पास के मनोरम दृश्यों की तस्वीर लेकर मनसा देवी मंदिर की ओर बढ़ गए.

रोपवे

मनसा देवी का मन्दिर हरकी पैड़ी से करीब 5-6 किलोमीटर ऊपर पहाड़ी पर स्थित है ऐसी मान्यता है कि यहां मांगी गई हर मनोकामना पूरी होती है, यहां जाने के दो-रास्ते हैं या तो पहाड़ी चढ़कर पैदल जाएं या रोपवे के जरिए, हमने ने रोपवे का रास्ता चुना,चंद मिनटों में हम मनसा देवी के दरबार में थे, चारों तरफ भक्तों की भीड़ और पूजन सामग्री की दुकानों से मंदिर में काफी चहल पहल थी.

मनसा देवी के दर्शन करने में हमें ज्यादा वक्त नहीं लगा, हम जल्दी ही पहाड़ी से नीचे उतर आए. दोपहर का वक्त हो चुका है था. भूख भी लगने लगी थी. लिहाजा होटल की तलाश की गई. जहां खाना खाने के बाद हम निकल पड़े शांतिकुंज के रास्ते पर.

लेकिन गायत्री परिवार का आश्रम कोरोना संकट के वजह से पर्यटकों के लिए बंद था. धूप चढ़ चुकी थी, हम भी थक चुके थे. ऐसे में एक युवक हमारे पास आया. जो आस-पास के दूसरे मंदिर घुमाने की बात कह रहा था. जिसकी बात हमने मान ली, टेंपो चालक ने हमें हरिद्वार के कई मंदिरों के दर्शन कराए. इन मंदिरों में सबसे खास बात रही राधा-कृष्ण मंदिर की. जिसकी निर्माण बेहद अनूठे ढंग से किया गया है. ये मंदिर कांच का बना है.

हम लोग मंदिर को देख ही रहे थे. कि अचानक पुजारी ने आवाज लगाई,  बातचीत में पता चला कि वे मेरे जिले के पास के जिले के ही हैं और 1984 में पत्नी के देहांत के बाद ईश्वर की सेवा में लग गए।

मैंने पुजारी जी के साथ उनकी अनुमति से एक तस्वीर ली और मंदिर से बाहर निकल आया. मंदिर से निकलने के बाद हम सीधे होटल गए. जहां करीब दो घंटे के आराम करने के बाद हम निकल पड़े, धर्मनगरी हरिद्वार में गंगा के किनारे होने वाली आरती के लिए. हम सीधे होटल से निकल हरकी पैड़ी पहुंचे.

शाम के वक़्त हरकी पैड़ी का नजारा, बेहद दिव्य था, तेज लहरों की आवाज़ और भक्ति में झूमते लोग, और आरती की भव्यता.

हम काफी देर तक आरती को देखते रहे. और आरती खत्म होने के बाद वापस होटल आ गए. अगली सुबह के इंतजार में

हरिद्वार से ऋषिकेश का सफर

अगली सुबह नींद कुछ जल्दी खुल गई,  हम लोगों को आज ऋषिकेश की यात्रा पर जाना था, मित्र अपनी जल्दबाजी में थे, वो जल्दी से जल्दी पहुंच जाना चाहते थे. फिर हम तैयार होकर टैक्सी स्टैंड के लिए निकले, जहां से करीब एक घंटे के सफर के बाद ऋषिकेश पहुंचे.

ऋषिकेश

ऋषिकेश पहुंचते ही सबसे पहले होटल की तलाश की गई, होटल में अपना सामान रखा, और फिर निकल गए रिवर राफ्टिंग के लिए (ऋषिकेश रिवर राफ्टिंग के लिए मशहूर है). रिवर राफ्टिंग का ये पहला अनुभव था. हम लोगों को सुरक्षा के लिहाज से कुछ खास टिप्स दिए गए थे. बोट पर कुल 5 लोग सवार हुए, जिन्हें कोई 16 किलोमीटर का सफर तय करना था.

सांकेतिक तस्वीर

शिवपुरी से बोट गंगा की लहरों पर हिचकोले खाती जैसे-जैसे आगे बढ़ती गई, नदी का धारा तेज होती गई.  करीब एक किलोमीटर के बाद पहली रैपिड आई, यहां आकर पहली बार रैपिड का मतलब समझ आया. रैपिड यानी पानी की तेज लहरें और बीच में बनता भंवर, जिनके बीच अक्सर वोट पलट जाती है। हमारी बोट भी रैपिड में घुसी. हम लोग तेज तेज चप्पू चलाने लगे, डर के मारे मैंने तो आंखे बंद कर लीं, किसी तरह रैपिड पास किया आंख खोल के देखा तो मेरे मित्र के चेहरे पर भी हवाइयां उड़ रही थीं. ।

मैं काफी डरा हुआ था, क्योंकि आगे और भी रैपिड आने वाली थी. खैर किसी तरह बोट अपनी मंजिल पर पहुंची, तब जाकर जान में जान आई, लेकिन ये अनुभव बेहद शानदार था.

रिवर राफ्टिंग के बाद हम लक्ष्मण झूला देखने गए. रात में सर्द हवाओं और चमकती रोशनी में नहाया लक्ष्मण झूला बेहद आकर्षक लग रहा था, हमने वहां पर कुछ फोटो लिए और वापस रूम पर आ गए

अगली सुबह ऋषिकेश के प्रसिद्ध त्रिवेणी घाट जाने का प्लान था तो हम लोग हाथ मुंह धोके सीधे त्रिवेणी घाट पहुंच गए, सुबह का समय और कल-कल बहती गंगा।

लोग गंगा में डुबकी लगा रहे थे. हम भी बिना देर किए पानी में उतर गए। ठंडे पानी में डुबकी लगाते ही एक अलग ही आनंद की एहसास हुआ. करीब एक घंटे स्नान के बाद हम लोगों ने घाट के चक्कर लगाए, आस-पास का क्षेत्र देखा, फिर दिल्ली वापसी की तैयारी में जुट गए. करीब 12 बजे दिल्ली के लिए बस पकड़ने के लिए हम बस स्टेशन पहुंच गए. जहां थोड़ी ही देर में बस हरिद्वार के लिए निकल पड़ी, करीब एक घंटे बाद हम फिर हरिद्वार में थे. जहां बस थोड़ी देर के लिए रुकी. और फिर निकल पड़ी दिल्ली के लिए हरिद्वार के मनोरम, दर्शनीय स्थलों को पीछे छोड़ते हुए. और हम हरिद्वार की यादों को दिल में समेटे पीछे छूटते हरिद्वार निहार रहे थे.

आशीष यादव

लेखक निजी चैनल में कार्यरत हैं, अभी हाल ही में अपने मित्र के साथ हरिद्वार और ऋषिकेश की यात्रा पर गए थे

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