आप इस पर यकीन करें, या नहीं, ये कोई रहस्य, या फिर कोई सपना नहीं है, ये हकीकत है, कि एक झील है, जहां से खजाना निकलता है. और ये हकीकत छिपी है दिल्ली से 500 किलो मीटर दूर हिमाचल प्रदेश के एक दूर दराज़ के इलाके में, दिल्ली से मनाली के रास्ते में मंडी तक 10 घंटे का सफर और वहां से 3 घंटे का बेहद मुश्किल रास्ता . तीन घंटे के इस मुश्किल सफर के बाद सामने आएगा वो कस्बा जिसकी हर तस्वीर में कोई न कोई रहस्य छिपा है. इस कस्बे का नाम है रोहांडा .

यहां पहुंच कर आपको लगेगा, जैसे मंजिल पर पहुंच गए, लगेगा कि आपकी मंजिल सामने दिख रहे पहाड़ की चोटी पर है, लेकिन जब आप ट्रैकिंग शुरु करेंगे, तब समझ आता है, कि असल सफर तो अब शुरु हुआ है. कच्चा, संकरा, पथरीला और बेहद खतरनाक रास्ता. एक भी ग़लत कदम और अंजाम भारी हो सकता है. ये सफर रोमांच को अलग ही स्तर पर ले जाता है.

रामायण और महाभारत काल से है संबंध !

स्थानीय लोगों के मुताबिक इस पूरे इलाके का संबंध रामायण काल. महाभारत के युद्ध और पांडवों से है, और इसके प्रमाण आपकों रास्ते में दिख जाएंगे. करीब एक घंटे की चढ़ाई के बाद ओक और देवदार के घने जंगल आपका स्वागत करेंगे. यहां आकर आपको महसूस होगा, कि भूगोल का रिश्ता इतिहास या लोक कथाओं से कितना गहरा होता है. पहाड़, पेड़, चट्टान और कुल मिलाकर किसी जगह की आबो हवा सिर्फ किताबी नहीं होती, ये सारी चीजें अपने आप में जीती जागती कहानियां होती हैं.यहां आस-पास एक खास किस्म के फूल दिखाई देंगे, जो शायद ही कहीं और मिलती हों. यहीं से थोड़ी देर पर स्थित  है कमरूनाग मंदिर, जहां छिपा है खजाने का रहस्य.

मंदिर से जुड़ी है कई लोककथाएं

इस मंदिर को लेकर कई कहानियां है, कहा जाता है, कि मंदिर के ऊपर कोई हवाई जहाज नहीं  उड़ सकता, जिन दो जहाजों ने मंदिर की छत पार करने की कोशिश की, वो क्रैश हो गए. हालांकि सच्चाई क्या है, कोई नहीं जानता. लोगों की मान्यता है कि इस मंदिर को न तो कोई जहाज पार कर सकता है और न ही कोई पक्षी. दो हादसों के बाद सरकार ने अब इस जगह हवाई उड़ान पर रोक लगा दी है.कमरूनाग का मंदिर हजारों साल पुराना है, 10 हज़ार फीट की ऊचाई पर बना ये मंदिर अपने आप में कई राज़ समेटे हुए. लकड़ी के बने इस मंदिर में छत तो है लेकिन दीवारें नही हैं. मंदिर चारों तरफ से पेड़ों से घिरा है. सामने है बड़ा सा मैदान, एक खजाने से भरी बड़ी सी झील

झील में 1000 टन सोना

स्थानीय लोगों को मुताबिक मंदिर के पास स्थित झील ही, खजाने का भंडार है. कहा जाता है, इस झील में 1000 टन से भी ज्यादा सोना, हीरे जवाहरात दबे हुए हैं. अब दिमाग में सवाल उठ सकता है, आखिर ये सोना जवाहरात आता कहां से है ? इस सवाल का जवाब आपके होश उड़ा सकता हैदरअसल झील में पड़ा खजाना, यहां आने वाले भक्तों की श्रद्धा और आस्था की बदौलत बना है. श्रद्धालु हर साल यहां करोड़ों का सोना, जवाहरात झील में डालते हैं. कई लोग तो ऐसे भी हैं जो अपने पूरे गहने और हीरे-जवाहरात तक झील में डाल देते हैं. सदियों से ये परंपरा चली आ रही है.

हर साल 14 जून को लगता है कमरूनाग मंदिर का मेला

हर साल 14 जून को कमरुनाग के मंदिर में मेला लगता है. एक हफ्ते तक चलने वाले मेले में देश-विदेश से श्रद्धालु आस्था और भक्ति के साथ आते हैं, मत्था टेकते हैं, मन्नत मांगते हैं और मन्नत पूरी होने के बाद कमरुनाग को चढ़ावा चढ़ाते हैं, जिसमें न सिर्फ गहने बल्कि कैश और करेंसी नोट भी होते हैं.

मेला खत्म होने के बाद इन नोटों को झील से निकालकर सुखाया जाता है. गिनती की जाती है और फिर बाजार से उतने ही रकम की सोना-चांदी खरीद कर वापस झील में डाल दिया जाता है. ऐसी मान्यता है कि कमरुनाग मंदिर के सामने इस झील में पड़ी एक-एक चीज पर देव कमरुनाग का हक है और यहां चढ़ाए गए पैसों का कोई और इस्तेमाल नही हो सकता है.

मान्यता है कि कमरुनाग के इस मंदिर से कोई भी खाली हाथ नहीं लौटता. हर साल लाखों लोग अपनी मन्नत पूरी होने पर सोने-चांदी के गहने, नकद पैसे और हीरे-जवाहरात झील में चढ़ाते हैं, सदियों से ऐसा होता आया है, लेकिन अब भी झील पूरी तरह भरी नहीं है.

आस्था और मान्यताओं के बीच राज्य सरकार ने भी खजाने की सुरक्षा को लेकर कई इंतजाम किए हैं. लेकिन देव कमरुनाग में आस्था रखने वाले कहते हैं कि कमरुनाग के खजाने को किसी हिफाज़त जरूरत नही, खुद देव कमरूनाग खजाने की हिफाज़त करते हैं.देव कमरुनाग की मान्यता और आस्था हिमाचल में ही नहीं बल्कि हिन्दुस्तान के बाहर भी है … कमरुनाग मंदिर हिमाचल की हसीन वादियों में छिपा एक अनमोल रत्न है, और एक रहस्य भी.

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