इतिहास से भी पुरातन, वैभवशाली विरासत का गवाह, गंगा की लहरों से सुशोभित, परंपराओं का अविरल और निर्मल प्रवाह, शिव शक्ति से दम-दम, बाबा के बम-बम से गुंजायमान बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी

बनारस, वो शहर जो इतिहास से भी ज्यादा प्राचीन है. जिसकी तंग गलियां सदियों को इतिहास की कहानी कहती है. जिसकी हर ईंट, पत्थर पर मिलते हैं भारतीय संस्कृति के निशां.

वाराणसी पहुंच कर अलग ही दृश्य नज़र आता है. समझना मुश्किल है. कि भगवान शंकर के त्रिशूल पर टंगी काशी को गंगा नदी के किनारे बसना था. या फिर गंगा को वाराणसी के किनारों पर बहना था. क्योंकि वाराणसी ही एकमात्र शहर है. जहां गंगा की धारा उल्टी दिशा में बहती है. हैं ना आश्चर्यजनक.

वारणसी अकेला शहर है, जहां गंगा उल्टी दिशा में बहती है

दरअसल वाराणसी में गंगा दक्षिण से उत्तर की ओर बहती है. कभी घाटों पर अठखेलियां करती हुई. तो कभी चमकीले रेत पर चढ़ती-उतरती गंगा की लहरें पर्यटकों को अपने मोहपाश में बांधती हुई. गंगा नदी के अलावा, वरुणा, गोमती समेत कई नदियां अर्द्धचंद्राकार वाराणसी के सौंदर्य में चार चांद लगाती

संगमनगरी प्रयागराज को तीर्थों का राजा कहा जाता है. तो वाराणसी की अक्षर विरासत का अनंत है. यहां नदियों की कल-कल है. तो घंटे घड़ियालों का नाद भी, गंगा में स्नान, उत्सव मनाते श्मशान, पंरपराओं का प्रवाह, जिंदगी का उत्साह. वाराणसी में सब रंग एक साथ दिखाई पड़ते हैं. काशी उस शहर का नाम है, जिसका ईश्वर श्मशान की राख से अपना श्रंगार करता है.

मणिकर्णिका घाट पर श्मसान की आग कभी ठंडी नहीं होती !

भारत में वैसे तो कई श्मशान घाट है. लेकिन वाराणसी के मणिकर्णिका घाट की अलग ही कहानी है. कहा जाता है, कि ये दुनिया का इकलौता श्मशान घाट है, जहां चिता की आग कभी ठंडी नहीं होती. यहा रोजाना करीब 300 शवों का अंतिम संस्कार किया जाता है. दिलचस्प बात ये, कि यहां मुर्दे को चिता पर लिटाने से पहले बाकायदा टैक्स वसूला जाता है.

दरअसल वाराणसी कोई शहर नहीं, जीवन-मरण के चक्र के बीच आनंद का स्वर्णिम अध्याय है. कहते हैं भारत विविधताओं का देश है, और ये विविधता वाराणसी की गलियों में दिखती है. ये गलिया किसी खोज, किसी व्यवस्था का परिणाम नहीं, बल्कि वक्त के बदलते समाज और समुदाय की व्यवस्था का परिणाण है. यहां हर समय और काल की छाप मिलती है.

विकास की नई ऊंचाईयों को छू रहा है बनारस

पिछले कुछ वक्त में वाराणसी में काफी कुछ बदला है. पिछली कुछ बरसों की बात करें, तो यहां के घाट पहले से कहीं सुंदर नज़र आते हैं. ट्रैफिक व्यवस्था भी पहले की अपेक्षा कहीं बेहतर हुई है. गंगा में क्रूज सेवा पर्यटकों का मन मोह लेती है.

वाराणसी का हर रुप निराला है. अस्सी घाट से वरुणा संगम घाट के बीच फैली करीब 100 घाटों की श्रंखला कहीं और नहीं दिखती. और फिर उगते सूर्य की लालिमा में नहाई गंगा से उभरती तस्वीरों में से साकार होता सुबह-ए-बनारस का वो दृश्य. देखते ही बनता है.

जीवन, प्रकाश और दिव्यता से परिपूर्ण वाराणसी की सुबह, प्रकृति के शाश्वत सौंदर्य का वो स्वरूप है. जिसकी परिकल्पना नहीं की जा सकती. या यूं कहें की यहां की फिजाओं में बिखरी देश की सनातन संस्कृति की खुशबू. जिसका बस एहसास किया जा सकता है. तो आप भी आइए बनारस दूसरे शब्दों में कहें , वाराणसी. बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी आपके इंतजार में है. यकीन मानिए ये शहर आपको आपसे मिलाता है.

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