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जहां पूरी होती है हर मनोकमना, आइए मां विंध्यवासिनी के धाम

सुदूर तक फैली विंध्य पर्वतमालाओं पर बिखरती प्रकृति की अनुपम छटा. कल-कल, निर्मल, अविरल पवित्र बहती गंगा और इसी के तट पर स्थित विंध्याचल.
विंध्याचल पर्वत ना सिर्फ प्राकृतिक सौंदर्य का अनूठा स्थल है. बल्कि संस्कृति का वो अद्भुत अध्याय भी है. जिसकी मिट्टी में पुराणों का विश्वास और अतीत का सार समाहित है.
प्राचीन काल से ही विंध्य क्षेत्र का अपना अलग महत्व है.मां विंध्यवासिनी के दर्शन के लिए हर साल लाखों श्रद्धालु, कृपालु, योगी, जोगी, महाधिराज विंध्याचल पहुंचते रहे हैं, और श्रृद्धा के परिगमन पर ये सिलसिला अनवरत जारी है.
तपोभूमि कहे जाने वाले विंध्याचल की तीर्थराज प्रयाग के आध्यात्मिक विस्तार की तरह ही अपनी महत्ता है. कहा जाता है कि यहां तप करने वाले मनुष्य को सिद्धि प्राप्त होती है. मां विंध्यवासिनी देवी अपने अलौकिक प्रकाश के साथ यहां नित्य विराजमान हैं.
विंध्य क्षेत्र में तीन देवियों मां विंध्यवासिनी, मां अष्टभुजा, मां काली के साथ-साथ छोटा रामेश्वरम के नाम से प्रसिद्ध शिव मंदिर है। साथ ही सीता कुंड यहां आने वाले तीर्थयात्रियों के लिए खास महत्व रखता है। ऐसी मान्यता है कि इस कुंड का जल औषधिपूर्ण है जिससे चर्म रोग ठीक हो जाते है।
पवित्र गंगा की अविरल धारा विंध्याचल को तीर्थराज प्रयाग से जोड़ती है. या यूं कहें गंगा की लहरों पर सनातन संस्कृति के दो प्रकाश स्तंभों का मिलन होता है। तीर्थराज प्रयाग और बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी के बीच गंगा के तट पर स्थित विंध्याचल सनातन संस्कृति के प्रचीनतम स्वरूप का वो उभार बिंदु है. जिसका जिक्र पुराणों और धार्मिक ग्रंथों में मिलता है.
विंध्य परिक्षेत्र का वैभव हमेशा से पर्यटन के मानचित्र पर अनुपम और अलौकिक रहा है..जिसके विकास के लिए प्रयास जारी हैं. यहां लगने वाले नवरात्रि मेले को राज्यस्तरीय मेले का दर्जा हासिल है.

मां विंध्यवासिनी के वाराणसी और मिर्जापुर से होकर पहुंचा जा सकता है.

विंध्याचल धार्मिक उत्साह की हलचल से भरा शहर है.यहां आकर मन मन को शांति और आध्यत्म का अहसास होता है.तो आप भी आइए और आध्यत्म की अविरल धारा में एक डुबकी लगाइये. आइए और साक्षी बनिये आस्था के पावन पथ पर बिखरे सनातन संस्कृति के उस गौरवमयी इतिहास के.जो देश की वैभवशाली विरासत का बखान करता है. अनुभव कीजिए प्रकृति के उस अनुपम सौदर्य को. जो विंध्य की पर्वतमालाओं से छट कर कल-कल करती गंगा की लहरों पर सुशोभित हो रहा है।।

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